भाग 1: बीजापुर की चुनौती और अफजल खान का दंभ
यह कहानी शुरू होती है सन् 1659 में, जब दक्षिण की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची हुई थी। एक ओर दिल्ली के सिंहासन पर औरंगज़ेब अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था, तो दूसरी ओर दक्षिण में बीजापुर की ‘आदिलशाही’ सल्तनत एक उभरते हुए खतरे से परेशान थी। वह खतरा थे-छत्रपति शिवाजी महाराज.
बीजापुर दरबार का सन्नाटा
शिवाजी महाराज एक-एक करके बीजापुर के किलों पर अपना अधिकार जमा रहे थे। जावली की विजय ने आदिलशाही की नींद उड़ा दी थी। बीजापुर की बड़ी साहिबा (राजमाता) ने दरबार में एक खुली चुनौती रखी: “कौन है जो शिवाजी को जिंदा या मुर्दा पकड़ कर ला सकता है?”
पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज की वीरता और युद्ध कौशल से हर कोई वाकिफ था। तभी एक भारी-भरकम शरीर वाला सेनापति आगे आया-अफजल खान। उसने बड़े गर्व से पान का बीड़ा उठाया और घोषणा की, “मैं उस शिवा को घोड़े से उतरे बिना बंदी बनाकर लाऊंगा।”
अफजल खान का आतंक
अफजल खान सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि एक क्रूर व्यक्तित्व का स्वामी था। वह करीब 7 फीट लंबा था और उसमें हाथियों जैसा बल बताया जाता था। वह अपनी विशाल सेना के साथ बीजापुर से निकला। उसका मुख्य उद्देश्य शिवाजी महाराज को उकसाना और उन्हें खुले मैदान में युद्ध के लिए मजबूर करना था।
रास्ते में उसने अपनी क्रूरता का परिचय देते हुए कई मंदिरों को नुकसान पहुँचाया और आम जनता को प्रताड़ित किया, ताकि महाराज क्रोधित होकर रायगढ़ से बाहर निकलें। लेकिन महाराज जानते थे कि अफजल की विशाल सेना के सामने खुले मैदान में लड़ना आत्मघाती होगा।
रणनीति का पहला चरण
शिवाजी महाराज ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। उन्होंने अफजल खान को संदेश भिजवाया कि वह उससे बहुत डरे हुए हैं और सीधे युद्ध नहीं करना चाहते। उन्होंने अफजल खान को बातचीत के लिए प्रतापगढ़ आने का न्यौता दिया।
प्रतापगढ़ के घने जंगल और दुर्गम पहाड़ियाँ (जावली का क्षेत्र) शिवाजी महाराज के अनुकूल थे और अफजल खान की भारी सेना और तोपखाने के लिए बेहद कठिन। अफजल खान अपने अहंकार में इस जाल को समझ नहीं पाया और अपनी सेना लेकर प्रतापगढ़ की ओर कूच कर गया।

भाग 2: जावली के घने जंगल और प्रतापगढ़ की व्यूह रचना
अफजल खान की विशाल सेना जब बीजापुर से निकली, तो उसका इरादा साफ था-शिवाजी महाराज को खुले मैदान मेंलाना । लेकिन महाराज की युद्धनीति ‘गनिमी कावा’ पर आधारित थी। वे जानते थे कि ताकत का जवाब केवल ताकत से नहीं, बल्कि सही स्थान और सही समय के चुनाव से दिया जाता है।
जाल बिछाया गया: जावली का चयन
शिवाजी महाराज ने जानबूझकर प्रतापगढ़ किले को इस मुलाकात के लिए चुना। प्रतापगढ़ ‘जावली’ के जंगलों के बीच स्थित था। यह क्षेत्र इतना घना और दुर्गम था कि सूरज की रोशनी भी जमीन तक मुश्किल से पहुँचती थी।
- रणनीतिक लाभ: जावली की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर अफजल खान की घुड़सवार सेना और भारी तोपें पूरी तरह बेकार थीं।
- मनोवैज्ञानिक चाल: महाराज ने अफजल खान को पत्र भेजा— “खान साहब, मैं आपसे डरता हूँ। आप ही मेरे पिता समान हैं। कृपया इस दुर्गम पहाड़ी पर आकर मुझे अभय दान दें।” इस विनम्रता ने अफजल खान के अहंकार को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। उसे लगा कि ‘शिवा’ सच में डर गया है।
प्रतापगढ़ की किलेबंदी
जैसे ही अफजल खान ने प्रतापगढ़ आने का निमंत्रण स्वीकार किया, महाराज ने अपनी सेना को गुप्त आदेश जारी कर दिए:
- कान्होजी जेधे और बाजी पासलकर जैसे वीर सेनापतियों को जंगलों में छिपा दिया गया।
- मराठा मावलों को आदेश था कि जब तक इशारे की तोप न चले, कोई भी हलचल न करे।
- अफजल खान की सेना के आने-जाने के रास्तों को चुपचाप नियंत्रित कर लिया गया।
भेंट की शर्तें
मुलाकात के लिए एक भव्य शामियाना (तंबू) किले की तलहटी में बनाया गया। शर्तें तय हुईं:
- दोनों पक्ष केवल 10 अंगरक्षकों के साथ आएंगे।
- तंबू के भीतर केवल 2 अंगरक्षक ही मौजूद रहेंगे।
- हथियार साथ लाने की अनुमति नहीं होगी (दिखावे के लिए)।
महाराज की गुप्त तैयारी

महाराज जानते थे कि अफजल खान विश्वासघाती है। उन्होंने ऊपर से साधारण दिखने वाले अंगरखे (कुर्ता) के नीचे ‘चिलखत’ (लोहे की जाली) पहनी। अपने सिर पर पगड़ी के अंदर ‘जीरेटोप’ (लोहे का हेलमेट) लगाया। सबसे महत्वपूर्ण, उन्होंने अपने बाएं हाथ में ‘बघनख’ (वाघनख) छिपाया और आस्तीन में एक छोटा खंजर जिसे ‘बिछुआ’ कहा जाता था।
खान अपने 12,000 सैनिकों की फौज के साथ नीचे रुका था, जबकि वह खुद पालकी में बैठकर ऊपर तंबू की ओर बढ़ा। उसे लग रहा था कि वह एक डरे हुए राजा से मिलने जा रहा है, पर उसे यह आभास भी नहीं था कि वह खुद चलकर काल के मुख में जा रहा है।
भाग 3: वह ऐतिहासिक भेंट-खंजर के वार पर बघनख का पलटवार

10 नवंबर 1659 की दोपहर। प्रतापगढ़ की तलहटी में एक भव्य शामियाना सजाया गया था। हवा में भारी तनाव था। एक ओर छत्रपति शिवाजी महाराज अपने दो अंगरक्षकों—जीवा महाला और संभाजी कावजी-के साथ आगे बढ़ रहे थे। दूसरी ओर, सात फीट का अफजल खान अपने अंगरक्षक सैयद बंदा के साथ तंबू में दाखिल हुआ।
तंबू के भीतर का दृश्य
जैसे ही महाराज तंबू में पहुंचे, अफजल खान ने अपनी बाहें फैला दीं। उसने कूटनीतिक मुस्कान के साथ कहा, “आओ शिवा, गले मिलो।” यह कोई प्रेम का बुलावा नहीं था, बल्कि काल का पाश था।
महाराज कद में खान से काफी छोटे थे। जैसे ही वे गले मिले, खान ने अपनी शक्तिशाली भुजाओं में महाराज को कस लिया। खान का इरादा उन्हें वहीं दबोचकर मारने का था। अचानक, खान ने अपनी कमर से खंजर निकाला और पूरी ताकत से महाराज की पीठ में घोंप दिया।
चिलखत ने बचाई जान
खंजर का वार तो हुआ, लेकिन लोहे के टकराने की आवाज़ आई। महाराज ने कपड़ों के नीचे जो ‘चिलखत’ (कवच) पहना था, उसने खंजर को शरीर के भीतर जाने से रोक दिया। महाराज तुरंत समझ गए कि खान ने विश्वासघात किया है।
बघनख का प्रहार
बिना एक पल गंवाए, महाराज ने अपने बाएं हाथ में छिपा बघनख (बाघ के नाखून जैसा घातक हथियार) निकाला और अफजल खान के पेट में उतार दिया। उसी समय दाहिने हाथ के बिछुआ (खंजर) से उन्होंने खान की आंतें बाहर निकाल दीं।
खान दर्द से चिल्ला उठा- “दगा! दगा!” (धोखा! धोखा!)। वह घायल अवस्था में तंबू से बाहर पालकी की ओर भागा।
अंगरक्षकों का युद्ध
तंबू के बाहर मौजूद खान के वफादार अंगरक्षक सैयद बंदा ने महाराज पर तलवार से हमला किया। लेकिन महाराज के अंगरक्षक जीवा महाला ने बिजली की तेजी से सैयद बंदा का हाथ काट दिया। इसी घटना से मराठी में एक प्रसिद्ध कहावत बनी:
“होता जीवा, म्हणून वाचला शिवा” > (अर्थ: क्योंकि वहाँ ‘जीवा’ था, इसलिए ‘शिवा’ बच गए।)
घायल खान को उसके पालकी ढोने वाले लेकर भागने लगे, लेकिन संभाजी कावजी कोंढालकर ने पीछा किया और अफजल खान का सिर कलम कर युद्ध को निर्णायक मोड़ दे दिया।
भाग 4: प्रतापगढ़ की विजय और स्वराज्य की गूँज
तंबू के भीतर अफजल खान का अंत होते ही, प्रतापगढ़ की चोटी से एक तोप दागी गई। यह कोई साधारण गोला नहीं था, बल्कि उन हजारों मराठा मावलों के लिए एक संकेत था जो जावली के घने जंगलों में सांस रोककर आदेश का इंतजार कर रहे थे।
मराठा सेना का प्रचंड आक्रमण
जैसे ही तोप की गूँज पहाड़ियों में टकराई, झाड़ियों और गुफाओं में छिपे कान्होजी जेधे, नेताजी पालकर और मोरपंत पिंगले के नेतृत्व में मराठा सैनिक बिजली की तरह अफजल खान की सेना पर टूट पड़े।
- दिशाहीन दुश्मन: खान की सेना को इस हमले का जरा भी अंदाजा नहीं था। जावली के तंग रास्तों पर उनके हाथी और घोड़े आपस में टकराने लगे।
- अचूक मार: मराठा सैनिक स्थानीय भूगोल से वाकिफ थे। उन्होंने तकनीक (Guerrilla Warfare) का इस्तेमाल करते हुए भारी नुकसान पहुँचाया। खान की सेना में भगदड़ मच गई।
विशाल सेना का पतन
कुछ ही घंटों में, बीजापुर की वह ‘अजेय’ मानी जाने वाली सेना तितर-बितर हो गई। मराठा सेना ने न केवल युद्ध जीता, बल्कि बड़ी मात्रा में युद्ध सामग्री भी जब्त की:
- करीब 65 हाथी, 4000 घोड़े, 1200 ऊँट, कीमती आभूषण और तोपें स्वराज्य के खजाने में शामिल हुईं।
- कई बीजापुरी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। शिवाजी महाराज ने अपने स्वभाव के अनुरूप, शरण में आए सैनिकों को सुरक्षा दी और घायलों का इलाज करवाया।

स्वराज्य की नैतिक विजय
प्रतापगढ़ की इस जीत ने पूरे भारत में शिवाजी महाराज का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया। यह केवल एक युद्ध की जीत नहीं थी, बल्कि एक विचार की जीत थी।
- विश्वास की बहाली: आम जनता को विश्वास हो गया कि एक छोटा राज्य भी बड़ी सल्तनतों को धूल चटा सकता है.
- दहशत का अंत: बीजापुर और मुगलों के मन में शिवाजी महाराज की कूटनीति और वीरता का खौफ बैठ गया.
- सम्मानपूर्ण व्यवहार: महाराज ने अफजल खान के शव का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करवाया और उसकी कब्र बनवाई, जो आज भी प्रतापगढ़ में मानवता और युद्ध के आदर्शों की याद दिलाती है.
प्रतापगढ़ का यह युद्ध भारतीय इतिहास का वह मोड़ था जिसने ‘हिंदवी स्वराज्य’ की नींव को पत्थर की तरह मजबूत कर दिया। अफजल खान का दंभ टूट चुका था और एक नए युग का उदय हो चुका था-छत्रपति शिवाजी महाराज का युग..
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