इतिहास के पन्नों में एक नाम ऐसा है जिसे अक्सर ‘बुराई का शिक्षक’ कहा गया, लेकिन उसी की लिखी किताब ‘द प्रिंस’ आज भी दुनिया के सबसे बड़े राजनेताओं और सीईओ (CEOs) की डेस्क पर मिलती है, वह नाम है निकोलस मैकियावेली.
मैकियावेली का सबसे प्रसिद्ध (और विवादित) विचार है :
“The Ends Justify the Means” यानी “साध्य ही साधन का औचित्य है..”
सरल शब्दों में कहें तो, यदि आपका लक्ष्य (Goal) बड़ा और महान है, तो उसे पाने के लिए इस्तेमाल किए गए रास्ते (Means) चाहे कितने भी कठोर या चालाकी भरे क्यों न हों, वे सही माने जाएंगे ..
आज के करियर,कॉर्पोरेट राजनीति और सफलता की अंधी दौड़ में क्या यह सिद्धांत वाकई काम करता है? आइए इसकी गहराई में उतरते हैं ..
1. मैकियावेली का नजरिया: आदर्शवाद नहीं, यथार्थवाद
मैकियावेली उस दौर में थे जब इटली आंतरिक कलह से जूझ रहा था, उन्होंने देखा कि जो राजा ‘अत्यधिक दयालु’ और ‘आदर्शवादी’ थे, वे जल्दी ही सत्ता गँवा बैठे , उनका तर्क था कि:
एक व्यक्ति जो हर स्थिति में अच्छा बनने की कोशिश करता है,उसका पतन उन लोगों के बीच निश्चित है जो अच्छे नहीं हैं..
मैकियावेली के लिए ‘साध्य'(End) था-राज्य की स्थिरता और शक्ति इसके लिए अगर राजा को झूठ बोलना पड़े या कठोर निर्णय लेने पड़ें, तो वह जायज था..
2.आज के करियर में इसका क्या अर्थ है ?
आज के दौर में हमारा ‘साध्य’ क्या है? एक ऊँचा पद, बड़ा बिजनेस साम्राज्य या वित्तीय स्वतंत्रता,इस लक्ष्य को पाने के लिए अक्सर हम ऐसे मोड़ पर खड़े होते हैं जहाँ हमें ‘छोटे समझौते’ करने पड़ते हैं..
- नेटवर्किंग बनाम अवसरवाद: क्या किसी ऐसे व्यक्ति से दोस्ती करना जिससे आप नफरत करते हैं,सिर्फ इसलिए सही है क्योंकि वह आपके करियर में मदद कर सकता है ? मैकियावेली कहेंगे-हाँ, क्योंकि आपका लक्ष्य करियर में आगे बढ़ना है..
- क्रेडिट और प्रतिस्पर्धा: अपनी टीम के काम का श्रेय खुद लेना ताकि आप प्रमोशन पा सकें ? यहाँ नैतिकता और मैकियावेली के बीच टकराव होता है..
3. ‘साध्य’ और ‘साधन’ के बीच का नैतिक संघर्ष
महात्मा गांधी ने मैकियावेली के बिल्कुल उलट बात कही थी। उन्होंने कहा था कि “साधन बीज की तरह हैं और साध्य पेड़ की तरह।” अगर बीज कड़वा है, तो पेड़ कभी मीठा नहीं हो सकता.
यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: क्या हम अपनी सफलता का आनंद ले पाएंगे अगर उसका रास्ता अनैतिकता से भरा हो ?
मैकियावेली का जवाब व्यावहारिक है-“दुनिया केवल परिणाम देखती है।” अगर आप सफल हो गए,तो कोई नहीं पूछेगा कि आप वहाँ कैसे पहुँचे। लेकिन अगर आप असफल रहे,तो आपकी ‘ईमानदारी’ का भी कोई मोल नहीं रहेगा..
4. सफलता का कड़वा सच: छोटे समझौते कब सही हैं?
आज के कॉर्पोरेट जगत में “Ends Justify the Means” को हम ‘प्रैग्मैटिज्म’ (Pragmatism) या व्यवहारवाद कहते हैं कुछ स्थितियाँ जहाँ यह सिद्धांत लागू होता दिखता है:
- कठोर निर्णय (Hard Decisions): एक कंपनी को दिवालिया होने से बचाने के लिए 100 लोगों की छँटनी करना यहाँ ‘साध्य’ (कंपनी की उत्तरजीविता) 100 लोगों की नौकरी जाने के ‘साधन’ को उचित ठहराता है
- कूटनीति (Diplomacy): पूरी सच्चाई न बताना ताकि एक बड़ी डील सुरक्षित हो सके जिससे हज़ारों कर्मचारियों का भविष्य जुड़ा हो
5. मैकियावेली के सिद्धांत का ‘डार्क साइड’ (खतरा)
अगर आप इस सिद्धांत को बिना सोचे-समझे अपनाते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- भरोसे की कमी: यदि लोग जान जाएं कि आप लक्ष्य के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, तो कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा
- मानसिक तनाव: अनैतिक रास्ते अक्सर इंसान को भीतर से खोखला कर देते हैं.
निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण
2026 की इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में, पूरी तरह से ‘संत’ होना आपको पीछे छोड़ सकता है, और पूरी तरह से ‘मैकियावेलियन’ होना आपको समाज की नज़रों में गिरा सकता है
सही तरीका क्या है? अपने ‘साध्य’ (End) को इतना महान और निस्वार्थ बनाएं कि उसके लिए किए गए छोटे समझौते समाज और आपके विवेक की नज़र में जायज लगें
अंततः सफलता केवल वह नहीं जो आप हासिल करते हैं, बल्कि वह भी है जो आप उस प्रक्रिया में ‘बनते’ हैं..

Leave a Reply