भारतीय इतिहास में ‘जौहर’ मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस और आत्म-सम्मान का प्रतीक है, जहाँ हज़ारों महिलाओं ने अपनी गरिमा की रक्षा के लिए जीवित अग्नि में समा जाना स्वीकार किया। अक्सर इसे ‘सती प्रथा’ के समान माना जाता है, लेकिन जौहर का संदर्भ, उद्देश्य और कारण सती से बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक त्रासदीपूर्ण थे।
1.जौहर क्या है ?
जौहर (Jauhar) मुख्य रूप से भारत के उत्तर-पश्चिम हिस्से, विशेषकर राजपूतों के बीच प्रचलित एक सामूहिक आत्मदाह की प्रथा थी। यह कृत्य तब किया जाता था जब किसी राज्य की सेना युद्ध में हारने की कगार पर होती थी और यह निश्चित हो जाता था कि दुश्मन सेना शहर या किले पर कब्ज़ा कर लेगी।
- उद्देश्य: दुश्मन के हाथों बंदी बनने, बलात्कार, गुलामी और जबरन धर्म परिवर्तन से अपनी पवित्रता और मर्यादा की रक्षा करना।
- प्रक्रिया: जब पुरुष ‘शाका’ (अंतिम युद्ध) के लिए केसरिया बाना पहनकर रणभूमि में मर-मिटने निकल जाते थे, तब महिलाएं सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार के साथ पवित्र अग्नि में कूद जाती थीं।
जौहर को समझने के लिए इसे सती से अलग करना अनिवार्य है :
2. जौहर बनाम सती: बुनियादी अंतर
| विशेषता | सती प्रथा | जौहर प्रथा |
| प्रकृति | व्यक्तिगत (पति की मृत्यु के बाद पत्नी द्वारा)। | सामूहिक (पूरे किले या समुदाय की महिलाओं द्वारा)। |
| कारण | धार्मिक मान्यता और विधवा जीवन से मुक्ति। | विदेशी आक्रमणकारियों के अत्याचार और बलात्कार से बचाव। |
| समय | पति की स्वाभाविक या युद्ध में मृत्यु के बाद। | पति के जीवित रहते हुए, लेकिन हार निश्चित होने पर। |
यह रहा ‘जौहर’ प्रथा पर एक विस्तृत और ऐतिहासिक तथ्यों से भरपूर लेख, जो इसके पीछे के दर्दनाक कारणों और वीरता की कहानियों को गहराई से समझाता है।
3. जौहर का सबसे बड़ा कारण:
ऐतिहासिक रूप से जौहर की घटनाओं में मध्यकाल (इस्लामिक आक्रमणों के दौरान) में भारी वृद्धि देखी गई। इसका मुख्य कारण दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान आक्रमणकारियों की युद्ध नीति थी।
- बलात्कार और गुलामी: उस समय की विदेशी सेनाएं विजित राज्यों की महिलाओं को ‘युद्ध की संपत्ति’ (Ghanimah) मानती थीं। उन्हें मंडियों में बेचा जाता था या हरम में कैद कर लिया जाता था।
- जबरन धर्म परिवर्तन: बंदी बनाई गई महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध धर्म बदलने पर मजबूर किया जाता था।
- इतिहासकारों का मत: प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चंद्र और अन्य विद्वान मानते हैं कि जौहर एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया थी। राजपूत महिलाओं के लिए अपनी मर्यादा खोने से बेहतर ‘मृत्यु का आलिंगन’ करना था।
4. वास्तविक उदाहरण: चित्तौड़गढ़ के तीन जौहर
चित्तौड़ का किला जौहर की सबसे हृदयविदारक और महान गाथाओं का साक्षी रहा है। यहाँ तीन प्रमुख जौहर हुए:
क. रानी पद्मिनी का जौहर (1303 ई.)
यह सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तो उसका उद्देश्य न केवल राज्य जीतना था, बल्कि रानी पद्मिनी को हासिल करना भी था।
- परिणाम: जब राजा रतन सिंह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, तो रानी पद्मिनी ने 16,000 राजपूत महिलाओं के साथ जलती चिता में छलांग लगा दी। खिलजी ने जब किले में प्रवेश किया, तो उसे विजय के नाम पर केवल राख और धुआं मिला।
ख. रानी कर्णावती का जौहर (1535 ई.)
गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तब रानी कर्णावती ने अपनी और अपनी प्रजा की रक्षा के लिए जौहर का मार्ग चुना। यह वही समय था जब उन्होंने हुमायूं को राखी भेजी थी, लेकिन मदद समय पर नहीं पहुँच सकी।
ग. तीसरा जौहर (1568 ई.)
जब मुगल सम्राट अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तब जयमल और फत्ता की वीरता के बावजूद हार निश्चित देखकर हज़ारों महिलाओं ने अपनी मर्यादा के लिए जौहर किया।
5. क्या यह ‘आत्महत्या’ थी? (एक यथार्थवादी विश्लेषण)
आज के आधुनिक नजरिए से यह कृत्य भयावह लग सकता है, लेकिन उस समय के यथार्थवाद (Realism) के अनुसार:
- विकल्पहीनता: उनके सामने विकल्प ‘सम्मानजनक मृत्यु’ या ‘अपमानजनक जीवन (गुलामी)’ के बीच था.
- मानसिक मजबूती: मैकियावेली के नजरिए से देखें तो, जौहर उन महिलाओं का अंतिम राजनीतिक और नैतिक स्टैंड (Stand) था, जहाँ उन्होंने दुश्मन को अपनी देह पर विजय पाने का मौका नहीं दिया.
निष्कर्ष: इतिहास का एक काला और गौरवशाली अध्याय
जौहर भारतीय इतिहास की एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो हमें याद दिलाती है कि विदेशी आक्रमणों ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को कितना प्रभावित किया था। यह मुगलों या खिलजी जैसे आक्रमणकारियों द्वारा किए जाने वाले यौन उत्पीड़न के डर और अपनी संस्कृति की रक्षा की पराकाष्ठा थी.
आज हमें इस प्रथा को ‘प्रमोट’ नहीं करना है, लेकिन उन महिलाओं के साहस और बलिदान को समझना आवश्यक है, जिन्होंने अपमान के बजाय अग्नि को चुना।
चित्तौड़ का घेरा (1303): अलाउद्दीन खिलजी की सैन्य कूटनीति और रानी पद्मिनी का बलिदान
1303 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ के किले पर हुआ आक्रमण भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित सैन्य घटनाओं में से एक है। यह केवल एक सुंदर रानी को पाने की सनक नहीं थी, बल्कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी विस्तार नीति और सामरिक (Strategic) आवश्यकता का परिणाम थी।
1. सामरिक महत्व: खिलजी ने चित्तौड़ को ही क्यों चुना?
अलाउद्दीन खिलजी एक यथार्थवादी (Realist) शासक था। चित्तौड़ पर आक्रमण के पीछे तीन मुख्य सैन्य कारण थे:
- व्यापारिक मार्ग: चित्तौड़ का किला गुजरात और मालवा जाने वाले व्यापारिक मार्गों के बीच में पड़ता था। दिल्ली की अर्थव्यवस्था के लिए इस मार्ग पर नियंत्रण अनिवार्य था।
- किले की अभेद्यता: चित्तौड़ का किला एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित था और इसे ‘किलों का सिरमौर’ कहा जाता था। सैन्य दृष्टि से, जो चित्तौड़ पर राज करता था, वह पूरे राजपुताना को नियंत्रित कर सकता था।
- मेवाड़ की बढ़ती शक्ति: गुहिल वंश के शासक रावल रतन सिंह की शक्ति बढ़ रही थी, जिसे खिलजी अपने लिए भविष्य का खतरा मानता था।
2. घेराबंदी की रणनीति (The Siege Tactics)
अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ पहुँची, लेकिन किले की बनावट ऐसी थी कि सीधी चढ़ाई असंभव थी। यहाँ खिलजी ने ‘Attrition Warfare’ (थकाने वाला युद्ध) की रणनीति अपनाई:
- घेराबंदी (The Siege): खिलजी ने किले के चारों ओर घेरा डाल दिया और रसद (Food & Water supply) काट दी। यह घेरा लगभग 6 से 8 महीने तक चला।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: खिलजी ने ‘मंजनीक’ (Manjaniqs) और ‘मगरिबी’ (पत्थर फेंकने वाली मशीनें) का उपयोग किया, लेकिन किले की ऊँचाई के कारण वे ज्यादा प्रभावी नहीं रहीं।
- धोखाधड़ी और कूटनीति: जब सैन्य शक्ति विफल रही, तो खिलजी ने कूटनीति का सहारा लिया। मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ के अनुसार, उसने संधि के बहाने रावल रतन सिंह को बंदी बना लिया।
3. राजपूतों का ‘काउंटर-अटैक’: गोरा और बादल की वीरता
जब राजा को बंदी बना लिया गया, तब राजपूत सेनापतियों गोरा और बादल ने एक अद्भुत सैन्य रणनीति बनाई।
- उन्होंने खिलजी को संदेश भेजा कि रानी पद्मिनी आत्मसमर्पण करेंगी और उनके साथ 700 पालकियां आएंगी।
- उन पालकियों में रानियां नहीं, बल्कि सशस्त्र राजपूत योद्धा थे। इस अचानक हमले (Surprise Attack) ने खिलजी के शिविर में खलबली मचा दी और राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया गया।
4. अंतिम संघर्ष: शाका और जौहर
जब खिलजी ने देखा कि वह छल से नहीं जीत सकता, तो उसने पूरी ताकत के साथ अंतिम हमला किया। किले के अंदर भोजन समाप्त हो चुका था। यहाँ राजपूतों ने दो अंतिम निर्णय लिए:
- जौहर (The Mass Immolation): रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हज़ारों महिलाओं ने किले के अंदर ‘जौहर कुंड’ में अग्नि प्रज्वलित की। वे जानती थीं कि खिलजी की सेना जीतने के बाद महिलाओं को बाजारों में बेचने और बलात्कार करने के लिए कुख्यात थी। अपनी पवित्रता बचाने के लिए उन्होंने अग्नि को चुना।
- शाका (The Final Charge): पुरुषों ने केसरिया बाना पहना और किले के द्वार खोल दिए। इसका अर्थ था—”या तो जीतेंगे या वीरगति पाएंगे।” इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि योद्धा का अंतिम विरोध माना जाता है।
5. युद्ध के बाद की क्रूरता: ‘कत्ल-ए-आम’
जब अलाउद्दीन खिलजी किले के अंदर पहुँचा, तो उसे रानी पद्मिनी नहीं मिली, बल्कि केवल राख के ढेर मिले। अपनी चिड़चिड़ाहट,झुंझलाहट मिटाने के लिए उसने चित्तौड़ के 30,000 निर्दोष नागरिकों के कत्लेआम का आदेश दिया। उसने किले का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर ‘खिज्राबाद’ रख दिया.
अलाउद्दीन खिलजी की जीत क्षेत्रीय (Territorial) थी, लेकिन नैतिक रूप से वह हार गया। रानी पद्मिनी का जौहर इस बात का प्रमाण था कि सम्मान (Honor) किसी भी साम्राज्य की शक्ति से बड़ा होता है।
रानी पद्मिनी की इस ऐतिहासिक और साहसी कहानी को 2018 में निर्देशक संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ‘पद्मावत’ के जरिए बड़े पर्दे पर उतारा.
इसी ऐतिहासिक युद्ध पर आधारित फिल्म ‘पद्मावत’ ने रानी पद्मिनी की वीरता को घर-घर पहुँचाया। फिल्म में खिलजी की हार को उसकी जीत से बड़ा दिखाया गया है, क्योंकि वह अंत तक रानी की परछाईं भी नहीं छू सका.
रानी पद्मिनी के साहस को शत्-शत् नमन
अंत में, शब्द कम पड़ जाते हैं उस अदम्य साहस को बयां करने के लिए, जो रानी पद्मिनी और उन हज़ारों वीरांगनाओं ने दिखाया था।
“धन्य है वह नारी शक्ति, जिसने अपनी गरिमा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए दहकती आग को भी फूलों की सेज समझकर गले लगा लिया। रानी पद्मिनी का यह बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्म-सम्मान का सबसे बड़ा सबक है।”
रानी पद्मिनी की इस अटूट वीरता और उनके पवित्र बलिदान को हमारा कोटि-कोटि नमन। ऐसी वीरांगनाओं के कारण ही भारत का इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है।
एक आधुनिक लीडर के लिए सबक:
- यथार्थवाद: दुश्मन की क्रूरता का सही आकलन करें (जैसा रानी पद्मिनी ने किया).
- तैयारी: घेराबंदी जैसे लंबे संकटों के लिए संसाधन जुटाकर रखें.
- दृढ़ता: जब हार निश्चित हो, तब भी अपना सिद्धांत (Stand) न छोड़ें.

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