शाइस्ता खान का काल: पुणे के लाल महल में मराठा साम्राज्य की पहली सर्जिकल स्ट्राइक

लाल महल पर छाया अंधकार

पुणे का लाल महल, जहाँ शिवाजी महाराज का बचपन बीता था, आज मुगलों के कब्ज़े में था. औरंगज़ेब के मामा, शाइस्ता खान ने विशाल सेना के साथ पुणे पर अधिकार कर लिया था और महाराज के ही घर को अपना डेरा बना लिया था.

शाइस्ता खान कोई साधारण सेनापति नहीं था. उसके पास हज़ारों घुड़सवार, हाथी और आधुनिक तोपें थीं. उसने कसम खाई थी कि वह मराठा शक्ति को जड़ से उखाड़ फेंकेगा. लाल महल के चारों ओर हज़ारों मुग़ल पहरेदार चौबीसों घंटे तैनात रहते थे. परिंदा भी पर न मार सके, ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी.

पुणे की जनता मुगलों के अत्याचार से त्रस्त थी. शाइस्ता खान को लगा था कि उसने शिवाजी महाराज को चारों तरफ से घेर लिया है और महाराज डर के मारे पहाड़ों में छिप गए हैं. लेकिन वह यह नहीं जानता था कि “शेर जब पीछे हटता है, तो वह डरता नहीं, बल्कि लंबी छलांग की तैयारी कर रहा होता है.”

राजगढ़ के किले में बैठे शिवाजी महाराज शांत थे, पर उनके दिमाग में एक ऐसी योजना बन रही थी जिसकी कल्पना करना भी मुमकिन न था. उन्होंने अपने विश्वसनीय जासूसों, जैसे बहिर्जी नाइक, से लाल महल के एक-एक गुप्त रास्ते और पहरेदारों की बदलती पालियों की जानकारी जुटा ली थी.

महाराज ने तय कर लिया था-मुगलों का अहंकार तोड़ने के लिए उन्हें उनके घर में घुसकर ही मारना होगा.

एक अभेद्य योजना और साहसी संकल्प

राजगढ़ की ऊँचाइयों पर, मशालों की हल्की रोशनी में शिवाजी महाराज अपने सेनापतियों के साथ मानचित्र पर झुककर विचार कर रहे थे. लाल महल की सुरक्षा लोहे की दीवार जैसी थी. वहां सीधा हमला करना आत्मघाती होता.

महाराज ने अपनी योजना सामने रखी:

“हम लाल महल में हमला करेंगे, लेकिन किसी सेना की तरह नहीं, बल्कि अदृश्य परछाइयों की तरह.”

रणनीति की बारीकियां

शिवाजी महाराज ने अपनी योजना के लिए केवल 400 सबसे वीर और चुनिंदा मावलों को चुना. योजना बेहद जोखिम भरी थी:

  • भेस बदलना: उस समय पुणे में आम नागरिकों के प्रवेश पर पाबंदी थी, इसलिए महाराज ने तय किया कि वे एक बारात का नाटक करेंगे.
  • समय का चुनाव: रमज़ान का महीना चल रहा था. महाराज जानते थे कि दिन भर के उपवास के बाद आधी रात को मुगल सैनिक गहरी नींद में होंगे.
  • प्रवेश द्वार: मुख्य द्वार के बजाय, वे महल के उन गुप्त रास्तों और खिड़कियों का उपयोग करेंगे जिन्हें महाराज बचपन से जानते थे.

आधी रात का प्रस्थान

5 अप्रैल, 1663 की काली रात. आसमान में बादल छाए थे, जो मराठों के लिए वरदान साबित हुए. महाराज ने अपने मावलों को संबोधित करते हुए कहा, “आज का कार्य केवल युद्ध नहीं, बल्कि स्वराज्य के सम्मान की रक्षा है. यदि सफल हुए तो इतिहास रचेंगे, और यदि वीरगति मिली तो अमर हो जाएंगे.”

हाथों में भवानी तलवार और दिल में ‘हर-हर महादेव’ का घोष लिए, वह छोटी सी टुकड़ी अंधेरे में विलीन हो गई. वे पुणे की गलियों में एक बारात की तरह घुसे, ढोल-ताशों के शोर में हथियारों की खनक छिप गई. मुग़ल पहरेदारों को लगा कि शहर के ही किसी अमीर की शादी है और उन्होंने उन्हें बिना जांचे जाने दिया.

शाइस्ता खान अपने विशाल शयनकक्ष में बेखबर सो रहा था, उसे इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि काल उसके दरवाजे पर दस्तक दे चुका है.

लाल महल में सर्जिकल स्ट्राइक

रात का सन्नाटा गहरा चुका था. लाल महल के चारों ओर हज़ारों मुग़ल सैनिक गहरी नींद में थे. महाराज और उनके 400 जांबाज मावले, जिन्हें महल के कोने-कोने का पता था, चुपचाप दीवारें फांदकर भीतर दाखिल हुए.

रसोई की दीवार और गुप्त प्रवेश

महल की मुख्य सुरक्षा को धता बताते हुए, महाराज ने उस दीवार को चुना जिसे ईंटों से चुनवा दिया गया था. बड़े ही शांत तरीके से ईंटें हटाई गईं. जैसे ही रास्ता बना, मराठे बिजली की फुर्ती से अंदर घुस गए. सबसे पहले उन पहरेदारों को ठिकाने लगाया गया जो मुख्य गलियारों में तैनात थे, ताकि शोर न मचे.

जैसे ही वे शाइस्ता खान के शयनकक्ष (Bedroom) के करीब पहुंचे, एक मुग़ल पहरेदार की नींद खुल गई. उसने शोर मचाने की कोशिश की, लेकिन मराठों की तलवारों ने उसे मौका नहीं दिया. अब तक महल के अंदर खलबली मच चुकी थी.

शाइस्ता खान का डर

हथियारों की खनक और ‘हर-हर महादेव’ के नारों ने शाइस्ता खान की नींद उड़ा दी. उसे समझ आ गया कि शिवाजी महाराज साक्षात उसके कमरे के बाहर पहुंच चुके हैं. मौत को सामने देख वह घबरा गया. अपनी जान बचाने के लिए वह खिड़की के रास्ते बाहर कूदने की कोशिश करने लगा.

जैसे ही वह खिड़की से बाहर निकलने वाला था, शिवाजी महाराज वहां पहुंच गए. महाराज की तलवार बिजली की गति से चमकी. शाइस्ता खान ने अपना हाथ आगे कर दिया-महाराज का वार इतना सटीक था कि शाइस्ता खान की तीन उंगलियां कटकर वहीं गिर पड़ीं.

अंधेरे और अफरा-तफरी का फायदा उठाकर, शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला, लेकिन वह अपनी उंगलियां और मुगलों का गुरूर वहीं छोड़ गया.

युद्ध का कोलाहल

महल के भीतर अब भीषण युद्ध छिड़ चुका था. मुग़ल सैनिकों को समझ नहीं आ रहा था कि हमलावर कितने हैं. महाराज ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया था-शाइस्ता खान को उसकी औकात दिखा दी गई थी. अब समय था सुरक्षित बाहर निकलने का.

सिंह की गर्जना और मुगलों का पलायन

लाल महल के भीतर हाहाकार मचा हुआ था. मुग़ल सेना को लग रहा था कि हज़ारों की संख्या में मराठों ने हमला कर दिया है, जबकि महाराज के साथ मुट्ठी भर मावले थे. शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर अंधेरे में कहीं छिप गया था, लेकिन उसका बेटा अब्दुल फतह इस संघर्ष में मारा गया.

चतुराई भरी वापसी

शिवाजी महाराज जानते थे कि जल्द ही बाहर तैनात हजारों की मुग़ल सेना महल को घेर लेगी. उन्होंने पहले से ही एक चाल चल रखी थी. उन्होंने अपने कुछ सैनिकों को आदेश दिया कि वे सिंहगढ़ की दिशा में मशालें जलाकर दौड़ें.

मुग़ल सेना ने जब देखा कि मशालें सिंहगढ़ की ओर जा रही हैं, तो वे उस दिशा में भागने लगे. जबकि असल में, महाराज और उनके जांबाज मावले पुणे के दूसरे रास्ते से कात्रज घाट की ओर निकल गए. जब तक मुगलों को अपनी गलती समझ आती, महाराज सुरक्षित दूरी तय कर चुके थे.

अपमान का घूंट

अगली सुबह जब सूरज निकला, तो नजारा मुगलों के लिए शर्मनाक था. दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य का सेनापति अपने ही महल में सुरक्षित नहीं था. शाइस्ता खान की कटी हुई उंगलियां इस बात का सबूत थीं कि मराठा शक्ति को कम आंकना उसकी सबसे बड़ी भूल थी.

जब दिल्ली में औरंगज़ेब को इस घटना की खबर मिली, तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि शिवाजी महाराज ने उसके सबसे भरोसेमंद सेनापति को उसके ही घर में घुसकर हरा दिया है. अपमान इतना बड़ा था कि औरंगज़ेब ने शाइस्ता खान का तबादला तुरंत बंगाल कर दिया, जो उस समय मुगलों के लिए एक तरह की सजा मानी जाती थी.

इतिहास का संदेश

इस घटना ने पूरे भारत में यह संदेश फैला दिया कि मुगलों को हराया जा सकता है. इसने मराठा सैनिकों में एक नया आत्मविश्वास भर दिया. लाल महल की यह सर्जिकल स्ट्राइक आज भी सैन्य रणनीति और अदम्य साहस का एक बेजोड़ उदाहरण है.

छत्रपति शिवाजी महाराज की जय..

समाप्त

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