शिव और सोम: क्यों धारण किया महादेव ने अपनी जटाओं में चंद्रमा ?
हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और रहस्यों से भरा है। उनके गले में लिपटे नाग से लेकर जटाओं से बहती गंगा तक, हर प्रतीक का एक विशेष अर्थ है। इनमें सबसे सुंदर और शीतल प्रतीक है उनके मस्तक पर चमकता ‘अर्धचंद्र’। शिव को इसी कारण ‘शशिशेखर’ और ‘चंद्रशेखर’ जैसे नामों से पुकारा जाता है। लेकिन एक वैरागी, जो भस्म रमाता है, उसने इस कोमल चंद्रमा को अपनी जटाओं में स्थान क्यों दिया? इसके पीछे पौराणिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं।
1. पौराणिक कथा: प्रजापति दक्ष का श्राप और शिव की करुणा
सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, चंद्रमा (सोमदेव) का विवाह राजा दक्ष की 27 पुत्रियों (27 नक्षत्रों) से हुआ था। चंद्रमा अपनी सभी पत्नियों में से रोहिणी को सबसे अधिक प्रेम करते थे और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते थे।
बाकी बेटियों के दुःख को देखकर राजा दक्ष ने क्रोध में आकर चंद्रमा को श्राप दे दिया कि उनका तेज धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा और वे क्षय रोग (Tuberculosis) से ग्रस्त होकर नष्ट हो जाएंगे। श्राप के प्रभाव से चंद्रमा का आकार घटने लगा और सृष्टि में अंधकार छाने लगा। तब देवताओं की सलाह पर चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र (वर्तमान सोमनाथ) में भगवान शिव की घोर तपस्या की।
- शिव का संरक्षण: भगवान शिव चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न हुए। यद्यपि वे दक्ष के श्राप को पूरी तरह विफल नहीं कर सकते थे, लेकिन उन्होंने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
- समाधान: शिव के स्पर्श से चंद्रमा को पुनर्जीवन मिला। यहीं से ‘कृष्ण पक्ष’ (चंद्रमा का घटना) और ‘शुक्ल पक्ष’ (चंद्रमा का बढ़ना) की शुरुआत हुई, जिससे चंद्रमा के अस्तित्व की रक्षा हुई।
2. दार्शनिक महत्व: मन पर नियंत्रण का प्रतीक
वेदों के अनुसार, “चंद्रमा मनसो जातकः” अर्थात चंद्रमा मन का स्वामी है। मन स्वभाव से चंचल होता है, ठीक उसी तरह जैसे चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती रहती हैं।
- योगेश्वर शिव: शिव ‘योगेश्वर’ हैं, जो समाधि में लीन रहते हैं। मस्तक पर चंद्रमा धारण करने का अर्थ है कि शिव ने अपने मन को पूरी तरह वश में कर रखा है। यह हमें संदेश देता है कि यदि मनुष्य को मोक्ष या शांति प्राप्त करनी है, तो उसे अपनी चंचल वृत्तियों और मन पर नियंत्रण पाना होगा।
3. विष की ज्वाला और शीतलता का संतुलन
समुद्र मंथन के दौरान जब भयंकर ‘हलाहल’ विष निकला, तो समस्त ब्रह्मांड को बचाने के लिए शिव ने उसे पी लिया। विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया और उनका शरीर अत्यधिक तपने लगा।
विष की उस भीषण अग्नि और दाह को शांत करने के लिए उन्होंने अपनी जटाओं में गंगा (जल तत्व) और मस्तक पर चंद्रमा (शीतलता का प्रतीक) को धारण किया। चंद्रमा अपनी शीतल किरणों से शिव के शरीर के तापमान को संतुलित रखता है। यह इस बात का प्रतीक है कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को अपना मस्तिष्क शांत रखना चाहिए।
4. काल (समय) के अधिपति ‘महाकाल’
चंद्रमा समय गणना का एक महत्वपूर्ण आधार है। हिंदू पंचांग में तिथियों का निर्धारण चंद्रमा की गति से होता है।
- शिव ‘महाकाल’ हैं, यानी वे समय के स्वामी हैं।
- अपने मस्तक पर चंद्रमा को एक आभूषण की तरह सजाना यह दर्शाता है कि काल (Time) उनके अधीन है। वे समय के आदि और अंत से परे हैं।
5. अर्धचंद्र का रहस्य: निरंतरता और आशा
शिव के मस्तक पर पूर्ण चंद्रमा नहीं, बल्कि ‘द्वितीय का चाँद’ (Crescent Moon) होता है। इसके पीछे भी एक गहरा दर्शन है:
- विकास: अर्धचंद्र बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। यह पूर्णता की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
- विनम्रता: यह दर्शाता है कि ज्ञान और शक्ति होने के बावजूद व्यक्ति को विनम्र रहना चाहिए।
- पुनर्जन्म: जैसे चंद्रमा नष्ट होने के बाद फिर से उदय होता है, वैसे ही जीवन में असफलता के बाद फिर से उत्थान संभव है।
भगवान शिव की जटाओं में चंद्रमा केवल एक सौंदर्य का तत्व नहीं है, बल्कि वह करुणा, धैर्य, मन के संयम और समय की गति का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक उपयोग किसी गिरे हुए को शरण देने (जैसे शिव ने श्रापग्रस्त चंद्रमा को दी) और अपने विकारों (विष) को शांत रखने में है।


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